भगवान दर्शन के लिए पट बंद, ढाबे पर रोटी नहीं, फिर भी आवश्यक वस्तु है दारू, पढ़े बात मन की – निलेश कांठेड़


कोरोनाकाल में देखने को मिल रहा

कलयुग का नया स्वरूप

  • कलयुग का जो स्वरूप हमारे मनुष्यों ने हजारों साल पहले शास्त्रों व पुस्तकों में इशारों से बताया था लगता वो इस कोरोनाकाल में साकार हो रहा है। व्यक्ति को पेट भरने के लिए रोटी भले आसानी से नहीं मिले और मंदिर में भगवान के दर्शन भी दुर्लभ हो लेकिन सर्वसुलभ है तो मदिरा। कोरोना के डर से मंदिरों के पट बंद है लेकिन आवश्यक सेवा के नाम पर मदिरालयों यानि शराब की दुकानों के शटर सुबह 6 से 11 बजे तक आपके लिए खुले है।
  • जिस शासन व्यवस्था में कोरोना फैलने के नाम पर ढाबे पर रोटी खाना अपराध हो और दारू सुलभ हो जाए उसे घोर कलयुग नहीं तो और क्या नाम दिया जाए। रेवन्यू के नाम पर शराब की ये दुकाने आवश्यक श्रेणी में आ गई है। मतलब ये है कि हमारी सरकारों को पैसे से मतलब भले ही वो हमारी युवा पीढ़ी को नशे की लत में डूबो अंधेरे भविष्य का खाका तैयार करने में लगी शराब की दुकानों से ही क्यों न मिले। जिस देश ने जीवनभर शराबबंदी की प्रेरणा देेने वाले महात्मा गांधी जैसे महापुरूष को राष्ट्रपिता का दर्जा दे रखा है उसे देश में लॉकडाउन ने शराब को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में ला दिया है।
  • राजस्व का तर्क देने वाली सरकारे ये भूल जाती है कि गुजरात, बिहार जैसे राज्य बिना शराब का कारोबार किए भी अपने राज्य की प्रगति करने के साथ खर्चे भी पूरे कर रहे है। ये जरूर है कि इन राज्यों में अवैध शराब पहुंचती है लेकिन कम से कम लॉकडाउन में जब आदमी रोटी के लिए परेशान है तब जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए दारू की दुकाने खुली तो नहीं होगी। चाय-नाश्ते की दुकानों पर भीड़ के नाम पर ताले लगा देने वाले सरकारी तंत्र को दारू की दुकानों पर सुबह लगने वाली भीड़ शायद कोरोना फ्री का सर्टिफिकेट लेकर घूमने वाली नजर आती है। सरकार यदि वास्तव में समाज का भला चाहने वाली है तो उसे कोरोनाकाल में शराब की बिक्री रोक पहले कोरोना की चेन तोड़ने के लिए घरों में बंद किए गए लोगों के पेट भरने की चिंता करनी चाहिए।

  • दवाओं की कालाबाजारी करने वाले इंसानियत के दुश्मन
    अमानवीयता केवल सरकारे ही नहीं हम और हमारा समाज भी दर्शा रहा है। सरकार द्वारा कोरोना से हमारी जिदंगी बचाने के लिए की जा रही सख्ती हमे बुरी लगती है और हम नियम तोड़ने की गलिया तलाशते है।
  • इस युग में जब एक पल जीवन का भरोसा नहीं है तब भी इंसानित को शर्मसार करने वाले भी कम नहीं है। मानवता के दुश्मन ऐसे व्यक्तियों में कोई ऑक्सीजन सिलेण्डर तो कोई जीवनरक्षक दवाओं की कालाबाजारी की पैसा कमाने की हवस में डूबे है। पूरे परिवार के परिवार उजड़ रहे है और सिसकियों की गूंज पत्थरदिलों की भी आंख नम बना देती है। चारों तरफ फैली नकारात्मकता से निराश का कवच ऐसे मजबूत हो गया है कि उसे तोड़ने के लिए उम्मीदों के ब्रहाशस्त्र की जरूरत है।
  • लेकिन पैसे को ही भगवान मानने वाले ऐसे समाजकंटक अब भी जरूरी दवाओं की कालाबाजारी और नकली दवाओं की बिक्री में लगे है। इस समय से जीवन से खिलवाड़ करने वालों के साथ कोई रहम नहीं दर्शाया जाना चाहिए।