संस्थान प्रधान जेठाराम ने बताया कि 1992 के बाद से विश्व दिव्यांग दिवस विकलांग व्यक्तियों के प्रति करुणा और विकलांगता के मुद्दों की स्वीकृति को बढ़ावा देने और उन्हें आत्म-सम्मान, अधिकार और विकलांग व्यक्तियों के बेहतर जीवन के लिए समर्थन प्रदान करने के लिए एक उद्देश्य के साथ मनाया जा रहा है
भारत में दिव्यांगों की स्थिति संसारके अन्य देशों की तुलना में थोड़ी दयनीय ही कही जाएगी। क्योंकि प्रेरित कम हतोत्साहित अधिक किया जाता है। मानसिकता पर, जो दर्द बांटने की बजाय बढ़ाने पर तुले होते हैं। एक निःशक्त व्यक्ति की जिंदगी काफी दुख भरी होती है। घर-परिवार वाले अगर मानसिक सहयोग न दें तो व्यक्ति अंदर से टूट जाता है। दिव्यांगों का इस तरह बिखराव उनके मन में जीवन के प्रति अरुचिकर भावना को जन्म देता है।
संस्थान प्रधान ने गर्म जोश के साथकहा कि समाज के इस वर्ग को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराया जाये तो वे कोयला को हीरा भी बना सकते हैं। समाज में उन्हें अपनत्व-भरा वातावरण मिले तो वे इतिहास रच देंगे और रचते आएं हैं। एक दिव्यांग की जिंदगी काफी दुखों भरी होती है। घर-परिवार वाले अगर मानसिक सहयोग न दें, तो व्यक्ति अंदर से टूट जाता है।इस अवसर पर प्रेम जी कुलरिया, शोभा सुथार, पुनाराम रोहिणा, रामचंद्र चिनिया, नेहा,कुमकुम आदि मौजूद रहे।